वरुण गांधी....फिल्हाल तो नाम ही काफी है....किसी खास इंट्रोडक्शन की जरुरत नहीं है....एक बात तो माननी पड़ेगी....वरुण गांधी ने अपनी पहचान बना ही ली......हां ये बात ज़रुर अलग है.....कि शायद वो खुद ही ये नहीं जानते होंगे....कि ये पहचान क्या उन्हें उनका भविष्य दिला पाएगी या फिर.....। ये हम सभी जानते हैं कि कुछ वक्त पहले तक वरुण की पहचान महज़ मेनका गांधी के बेटे के रुप में ही थी........लेकिन आज उनके घटिया और विवादास्पद भाषण को सुनने के बाद....कोने कोने में उनकी पहचान हो चुकी है.
लेकिन एक बात समझ नहीं आयी.......रासुका लगने से पहले भड़के-भड़के से नज़र आने वाले वरुण जेल से बाहर आने के बाद थोड़े कम भड़कीले नज़र आए....उनके भाषण में वो भड़काऊ पन तो था...लेकिन थोड़ा दबा-दबा.....और हां वरुण ने जेल से बाहर आकर जो पहला भाषण दिया.....वो फुल इमोश्नल देसी ड्रामे से लबरेज़ था...जिसमे वो एक बच्चे की तरह अपनी मां के पल्लू से भी चिपके नज़र आए.... लेकिन साथ ही वरुण ने मंच से एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ की तरह पीलीभीत की जनता से गुहार लगाई ....कि उनकी मां के आंसुओं का जवाब जनता देगी....बहुत बढ़िया वरुण.....कर्म तुम करो....मां तुम्हारी रोए....और हिसाब किताब करे जनता....जनता इतनी भोली भी तो नहीं....जो यूंही तुम्हारी बातों में आ जाए........
वरुण गांधी...वो गांधी जिसकी जड़ों में झांकने पर पुरानी राजनीतिक गलियां तो नज़र आती हैं......लेकिन अफसोस.....वो गलियां.... वरुण को राजनीतिक गलियांरों में पांव रखने की हसरत को पूरा नहीं करा पाती......
वरुण के साथ जो हो रहा है.....उसे वरुण वक्त रहते समझ नहीं पा रहे हैं....और ये नासमझी कहीं उन्हें डुबो ना दे.....वरुण गांधी ने जिस वक्त ये भड़काऊ भाषण देकर उन्माद फैलाया था...उस समय बीजेपी ने बड़ा आश्वस्त करते हुए उनके ऊपर अपना हाथ रखा था.....लेकिन उसके बाद की उनकी रैली में सारा नज़ारा एकदम अलग और स्पष्ट था....भाषण के बाद वरुण को बीजेपी के पोस्टर ब्वाय के रुप में प्रोजेक्ट किया गया...नरेन्द्र मोदी के साथ साथ झंडो और बैनरो पर भी उन्हें जगह मिली..... ....लेकिन शायद वरुण जेल से बाहर आने के बाद बदले हुए हालात देख और समझ नहीं पाए....जेल से बाहर आने के बाद तुरन्त होने वाली रैली से हिंदुत्व को दर्शाने वाले सारे पोस्टर और बैनर्स गायब थे.....
हिंदुत्व के बहाने एक बार फिर बीजेपी ने उन्हें अपना मुखौटा बनाने की कवायद तो की...और हो सकता है कि आगे भी करे.....लेकिन वरुण गांधी के नामांकन के वक्त....बीजेपी के किसी भी बड़े नाम ने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराने में ही अपनी भलाई समझी....लेकिन इतने पर भी वरुण को अपनी खोखली नींव की पहचान उजागर नहीं हो पायी....वरुण या मेनका की पेशानी पर फिल्हाल तो बल पड़ते नज़र नहीं आते लेकिन अगर यही हालात रहे तो ये ज़रुर है कि वरुण कहीं राजनीतिक बिसात पर पड़े एक प्यादे के रुप में ना रह जाएं....फिल्हाल तो वरुण गांधी.....बीजेपी के गांधी के तौर पर प्रोजेक्ट किए जा रहे हैं और घूमघूमकर धुंआदार प्रचार भी कर रहे हैं.....हिंदुत्व का चेहरा बनते ....भगवा रंग में डूबे....
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मंगलवार, 28 अप्रैल 2009
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009
आडवाणी....अस्सी की उम्र और प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश.....आखिर क्यों....??
एक ज़माना हो गया....आडवाणी को राजनीति में अपने बाल सफेद करते ....आज आडवाणी किसी भी सूरत में प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं.....हालांकि आडवाणी की ये इच्छा बरसों से उनके सीने में दबी हुयी थी.....जो मौका नहीं मिलने पर एक टीस में परिवर्तित होती चली गयी.....आडवाणी के साथ विडंबना ये है कि वो अपनी उम्र के अस्सीवें दशक में हैं......और वो ये बात भी बखूबी जानते हैं.....कि अभी नहीं तो कभी नहीं......
क्योंकि कल किसी ने नहीं देखा....और कल के सपने की वजह से वो आज को खोना नहीं चाहते ....आडवाणी क्या चाहते हैं और क्या नहीं.....हालांकि इस बात से जनता को निजी तौर पर कोई सरोकार नहीं है.....सरोकार है तो महज़ उनके अब तक के हिसाब किताब से.....।
आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की हसरत का सफर बरसों पहले से ही शुरु हो जाता है..जब आडवाणी संघी थे.....संघ से शुरुवात करने वाले आडवाणी....बीजेपी की नींव रखने वाले नामों में शुमार हैं....हमेशा ही अटल बिहारी वाजपेयी का दांया हाथ बनकर रहने वाले आडवाणी ने अपनी पकड़ राजनीति में हमेशा ही मज़बूत बनाकर रखी....
ये बात अलग है कि आडवाणी का दामन बहुत ज्यादा दागी भी नहीं और बहुत पाक साफ भी नहीं.....वो आडवाणी ही थे.....जिनकी उमाभारती (फिल्हाल हाशिए की राजनीति में पड़ीं) के साथ खुशी का जश्न मनाते तस्वीरें पूरी दुनिया के अखबारों में छपी थी ....जब बाबरी मस्जिद को ढहाया गया था.....वो भी आडवाणी ही थे.....जो मंच से जयश्रीराम की हुंकार लगाते थे....और अपनी हाईटेक रथयात्रा के जरिए पूरे देश में घूम-घूम कर रामलहर का उन्माद फैला रहे थे और बीजेपी के लिए वोट बैंक मज़बूत कर रहे थे....बीजेपी उनका ये उपकार कभी नहीं भूलेगी....रामलहर के उन्माद के बाद ही आडवाणी की पूरे देश में तीखी और सक्रिय भूमिका निकलकर सामने आयी....वो जनता से सीधे तौर पर जुड़े और उनकी भावनाओं को बखूबी कैश करवाया......
आडवाणी पर कंधार कांड का भी दाग है...कुछ परोक्ष और कुछ अपरोक्ष रुप से इसका दंश वो आज भी झेल रहे हैं......इसके अलावा भी आडवाणी विवादों में एक बार फिर फंसे.....जब उन्होंने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान अपने आप को सेक्यूलर बनाने की कोशिश में बैठे बिठाए संघ से दुश्मनी मोल ले ली...आडवाणी ने वहां जिन्ना की तारीफ में कसीदे पड़े औऱ इधर संघ ने उनसे हाथ खींच लिए......भारतीय राजनीति की बिसात पर संघ की ये खटास थोड़ी महंगी पड़ी और राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष नियुक्त कर दिए गए.......
इसके अलावा आडवाणी आज के वक्त के मुताबिक चलने में भी माहिर माने जाते हैं...उन्हें अपनी निजी ज़िंदगी को मीडिया के ज़रिए कैश करवाने में कोई गुरेज़ नही हैं...
आडवाणी फिल्मों के शौकीन हैं.....ब्लॉग लिखते हैं.....अपनी बेटी को सबसे करीब कहते है....ये सारी बातें मीडिया के ज़रिए ही बाहर आती रहती हैं...
आडवाणी बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं लेकिन रिटायरमेंट और उम्र के मसले पर चुप्पी साधते हैं....आज के युवा समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले नए चेहरों जैसे राहुल गांधी से मुकाबला करने को सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्विन्दिता करार देते है.....
आडवाणी भाषण तो बहुत मुखर होकर देते हैं....युवा भारत में घुलना मिलना भी पसंद करते हैं पर कहीं ना कहीं शायद वो ये भूल जाते हैं....या समझ नहीं पाते....कि आज का भारत उन्मादी नहीं है.....वो भावुक होकर वोट नहीं देता है....उसे उन पुराने गड़े मुर्दों से कोई सरोकार नहीं है.....क्योंकि आज का युवा ज्यादा विकसित....प्रतिभाशाली और युवा भारत का प्रतिनिधित्व करता है....वो मतदान के गिरते प्रतिशत को भी नहीं समझ पाते ....वो ये भी नहीं समझ पाते कि वोट डालने के लिए पप्पू अभियान चलाने पड़ते हैं....जनता बदल चुकी है...।
आडवाणी आज बाकी राजनीतिक लोगों के काले धन को भारत वापस लाने का सवाल खड़ा कर हमदर्दी या एक रैशनल वोट चाहते हैं तो वो ये क्यों भूल जाते हैं कि वो खुद भी उसी जमात का ही एक हिस्सा है....जिसे हम मौकापरस्त बिरादरी के नाम से भी जानते हैं....और जिस हम्माम में सभी नंगे होते हैं.....आडवाणी ये क्यों भूल जाते हैं...कि जनता उनके दामन को पाक साफ मानेगी और उनकी लच्छे दार बातों में आकर ये सवाल नहीं उठाएगी....कि क्या स्विस बैंक में उनका कोई एकाउंट नहीं....क्या उन्होनें कभी काला धन नहीं कमाया.....क्या उन्होंने कभी वो काम नहीं किए...जिनके लिए राजनीति की गलियां बदनाम मानी जाती हैं.....
हालांकि राजनीति में सच्चाई की कोई कसौटी नहीं....फिर भी आडवाणी चाहते हैं कि जनता उन्हें चुनें....उन्हें अपना वोट दे....और उनकी बरसों पुरानी सुलगती इच्छा को मूर्त रुप देकर उन्हें हिंदुस्तान का तख्तोताज़ सुपुर्द करे........आखिर क्यों...??
क्योंकि कल किसी ने नहीं देखा....और कल के सपने की वजह से वो आज को खोना नहीं चाहते ....आडवाणी क्या चाहते हैं और क्या नहीं.....हालांकि इस बात से जनता को निजी तौर पर कोई सरोकार नहीं है.....सरोकार है तो महज़ उनके अब तक के हिसाब किताब से.....।
आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की हसरत का सफर बरसों पहले से ही शुरु हो जाता है..जब आडवाणी संघी थे.....संघ से शुरुवात करने वाले आडवाणी....बीजेपी की नींव रखने वाले नामों में शुमार हैं....हमेशा ही अटल बिहारी वाजपेयी का दांया हाथ बनकर रहने वाले आडवाणी ने अपनी पकड़ राजनीति में हमेशा ही मज़बूत बनाकर रखी....
ये बात अलग है कि आडवाणी का दामन बहुत ज्यादा दागी भी नहीं और बहुत पाक साफ भी नहीं.....वो आडवाणी ही थे.....जिनकी उमाभारती (फिल्हाल हाशिए की राजनीति में पड़ीं) के साथ खुशी का जश्न मनाते तस्वीरें पूरी दुनिया के अखबारों में छपी थी ....जब बाबरी मस्जिद को ढहाया गया था.....वो भी आडवाणी ही थे.....जो मंच से जयश्रीराम की हुंकार लगाते थे....और अपनी हाईटेक रथयात्रा के जरिए पूरे देश में घूम-घूम कर रामलहर का उन्माद फैला रहे थे और बीजेपी के लिए वोट बैंक मज़बूत कर रहे थे....बीजेपी उनका ये उपकार कभी नहीं भूलेगी....रामलहर के उन्माद के बाद ही आडवाणी की पूरे देश में तीखी और सक्रिय भूमिका निकलकर सामने आयी....वो जनता से सीधे तौर पर जुड़े और उनकी भावनाओं को बखूबी कैश करवाया......
आडवाणी पर कंधार कांड का भी दाग है...कुछ परोक्ष और कुछ अपरोक्ष रुप से इसका दंश वो आज भी झेल रहे हैं......इसके अलावा भी आडवाणी विवादों में एक बार फिर फंसे.....जब उन्होंने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान अपने आप को सेक्यूलर बनाने की कोशिश में बैठे बिठाए संघ से दुश्मनी मोल ले ली...आडवाणी ने वहां जिन्ना की तारीफ में कसीदे पड़े औऱ इधर संघ ने उनसे हाथ खींच लिए......भारतीय राजनीति की बिसात पर संघ की ये खटास थोड़ी महंगी पड़ी और राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष नियुक्त कर दिए गए.......
इसके अलावा आडवाणी आज के वक्त के मुताबिक चलने में भी माहिर माने जाते हैं...उन्हें अपनी निजी ज़िंदगी को मीडिया के ज़रिए कैश करवाने में कोई गुरेज़ नही हैं...
आडवाणी फिल्मों के शौकीन हैं.....ब्लॉग लिखते हैं.....अपनी बेटी को सबसे करीब कहते है....ये सारी बातें मीडिया के ज़रिए ही बाहर आती रहती हैं...
आडवाणी बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं लेकिन रिटायरमेंट और उम्र के मसले पर चुप्पी साधते हैं....आज के युवा समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले नए चेहरों जैसे राहुल गांधी से मुकाबला करने को सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्विन्दिता करार देते है.....
आडवाणी भाषण तो बहुत मुखर होकर देते हैं....युवा भारत में घुलना मिलना भी पसंद करते हैं पर कहीं ना कहीं शायद वो ये भूल जाते हैं....या समझ नहीं पाते....कि आज का भारत उन्मादी नहीं है.....वो भावुक होकर वोट नहीं देता है....उसे उन पुराने गड़े मुर्दों से कोई सरोकार नहीं है.....क्योंकि आज का युवा ज्यादा विकसित....प्रतिभाशाली और युवा भारत का प्रतिनिधित्व करता है....वो मतदान के गिरते प्रतिशत को भी नहीं समझ पाते ....वो ये भी नहीं समझ पाते कि वोट डालने के लिए पप्पू अभियान चलाने पड़ते हैं....जनता बदल चुकी है...।
आडवाणी आज बाकी राजनीतिक लोगों के काले धन को भारत वापस लाने का सवाल खड़ा कर हमदर्दी या एक रैशनल वोट चाहते हैं तो वो ये क्यों भूल जाते हैं कि वो खुद भी उसी जमात का ही एक हिस्सा है....जिसे हम मौकापरस्त बिरादरी के नाम से भी जानते हैं....और जिस हम्माम में सभी नंगे होते हैं.....आडवाणी ये क्यों भूल जाते हैं...कि जनता उनके दामन को पाक साफ मानेगी और उनकी लच्छे दार बातों में आकर ये सवाल नहीं उठाएगी....कि क्या स्विस बैंक में उनका कोई एकाउंट नहीं....क्या उन्होनें कभी काला धन नहीं कमाया.....क्या उन्होंने कभी वो काम नहीं किए...जिनके लिए राजनीति की गलियां बदनाम मानी जाती हैं.....
हालांकि राजनीति में सच्चाई की कोई कसौटी नहीं....फिर भी आडवाणी चाहते हैं कि जनता उन्हें चुनें....उन्हें अपना वोट दे....और उनकी बरसों पुरानी सुलगती इच्छा को मूर्त रुप देकर उन्हें हिंदुस्तान का तख्तोताज़ सुपुर्द करे........आखिर क्यों...??
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