मैं भगवान को नहीं मानती.......... मतलब यहां-वहां.....घर,मंदिर, गली, चौराहों, पीपल, बरगद की छांव तले मौजूद असंख्य देवी-देवताओं की मूर्तियों को मैं नहीं मानती...हालांकि मेरे परिवार वाले बिल्कुल किसी भी पारंपरिक हिंदुस्तानी ब्राह्मण की तरह ही परंपराओं का निर्वाह करने वाले....व्रत,पूजा,दान,धर्म,त्यौहार का पालन करने वाले ही हैं....लेकिन मेरी सोच उनसे थोड़ी अलग है.....किसी भी आम धार्मिक और पारंपरिक खानदान की तरह मेरा भी खानदान है जिसमें पीढ़ियों से लोग अपनी परंपराओं को निभाते चले आ रहे हैं.....बचपन में मुझे भी यही संस्कार दिए गए और मैं बाकी लोगो की तरह ही पूर्णिमा को होने वाली कई सत्यनारायण की कथाओं की सहभागी रही हूं ...कई नवरात्रि,,,शिवरात्रि,,,जन्माष्टमी आदि जैसे धार्मिक उत्सवों की भी...लेकिन मुझे भगवान के अस्तित्व पर शक होता है......।।
पर धीरे धीरे जैसे जैसे मैं अपने आसपास के सामाजिक ढांचे को समझने लगी....मुझे समझ आने लगा कि किस तरह से समाज को काबू में करने और रुल करने के लिए,,,,लोगों को डराकर रखने और उन पर शासन करने के लिए......उन्हें कुछ निश्चित दायरो में बांधकर रखने के लिए धर्म को ढाल बनाया गया उसे पैदा किया गया होगा। हिंदु धर्म मे कहा जाता है कि चौरासी करोड़ देवी-देवता हैं मुझे एक साथ कहीं वो नज़र नहीं आए ना किसी मंदिर में ना किसी किताब में....सर्वाधिक पूजे जाने वाले देवता ब्रहमा,विष्णु,महेश और गणपति लेकिन आज तक गणपति के सर का राज कोई नही बता पाया कि ह्यूमन बॉडी के ऊपर हाथी का सिर कैसे लग सकता है...और अगर दलील ये दी जाए कि वो भगवान हैं तो फिर भगवान का सर कट कैसे सकता है और अगर कट भी गया तो फिर उनका वोही सर क्यों नहीं लगाया गया....और भगवान को इन जानवरों की सवारी क्यों करनी पड़ती है...जैसे चूहा,उल्लू,गरुड़,हाथी,सिंह.... मुझे कोई मेरे सवालों का जवाब नही देता......
कई चीज़ें मुझे कॉंट्राडिक्टरी भी लगती हैं....जैसे ब्राह्मणों के लिए मांस-मदिरा का सेवन निषेद्ध कहा गया है....लेकिन वेद-पुराण,ग्रन्थों मे देवताओं के सोमरस का महिमामंडन किया जाता है......इसके अलावा श्रीराम के आगे मर्यादा पुरुषोत्तम लगाया जाता है लेकिन वो मुझे किसी आम राजा से ज्यादा कभी नज़र नहीं आते....राजपाट चलाने के अलावा उन्होंने ऐसा क्या किया जिसके लिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बोला जाए.......जो इंसान अपनी पत्नी की इज्जत नही कर सकता....अपने बच्चों को बाप का हक़ नहीं दे सकता वो काहे का राजा और काहे का भगवान.....
इसके अलावा और भी बहुत सी बातें है जो मुझे कन्फ्यूज़ करती हैं....कहते हैं कि भगवान अन्तर्यामी होते हैं.....इसका मतलब उन्हें पहले ही पता चल जाता है....फिर हमारी पौराणिक कथाएं....राक्षसों के अत्याचारो की कहानियां क्यों सुनाती हैं....क्यों ऋषि मुनियों की हत्याएं दिखायी जाती है......इस हिसाब से तो सब कुछ बहुत सुन्दर होना चाहिए था.....और अगर ये कहा जाए कि सृष्टि कुछ नियम-कायदों से चलती है...जो होना है वो तो होकर ही रहता है......तो फिर इतनी मारा-मारी और उधेड़बुन क्यों......क्यों लोग कतारों मे लग लग कर विद्या,बुद्धि,धन,औलाद,सफलता, मांगने जाते हैं.......
भगवान तो एक ही हैं....हमारे अंदर भी हैं......ऐसा कहा जाता है.....फिर तिरुपति औऱ शिरडी क्यों सबसे धनवान मंदिर माने जाते हैं.........मेरी गली के बाहर वाला मंदिर क्यों उतना ही महत्व नहीं ऱखता जितना वैष्णों देवी का मंदिर....
भगवान इतने ही अंतर्यामी है तो ईराक क्यों जलता है....तालिबानी कैसे इतने निरंकुश हो सकते हैं.....अलकायदा का बुरा क्यों नहीं होता......इंसानो के अंदर दुर्भावनाएँ क्यों आ जाती हैं...एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों हो जाते है....क्यो नही भगवान जादू कर देते...और क्या भगवान को दिखता नही कि धर्म को बेचने वाले भगवान के नाम का चोला पहनकर.....कभी आसाराम तो कभी सुंधाशू जी महाराज..तो कभी किरीट महाराज तो कभी कोई सी महिमामयी माता....बनकर खुद तो अरबों की संपत्ति बटोरते है और लोगों को प्रवचन देते हैं....लोभ मत करो....मुझे सिर्फ ये लोग बेहतरीन बिज़नेस माइंडेड नज़र आते हैं....IIM के बच्चों को इनकी क्लासेस ज़रुर अटेड करनी चाहिए....इन्हे सबसे अच्छी तरह पता है कि आम जनता की नब्ज़ कहां कमज़ोर है कहां पकड़नी चाहिए.......और अब तो ये भी स्टेटस सिंबल में कंवर्ट हो गए हैं जिसके पास जितना पैसा उतना ही वो फलां महाराज या मां के करीब....आरती करो.....पांव छुओ....आशीर्वाद लो.....
मेरा सवाल ये भी है कि अगर भगवान कण-कण में है तो हमें इन धार्मिक चैनल्स की जरुरत क्यों पड़ती है.....क्या ये दुनिया पाखंड का ढोंग करती है या बस यूंही करते है वाली किसी लकीर के पीछे आंखे मूंदे चली जा रही है...राम के प्रति अन्ध भक्ति दिखाओ....बाबरी मस्जिद गिरा दो....गंगा भी मौजूद है सारे पापों को धोने के लिए.....बहुत अजीब लगता है ये सब....ऐसा जैसे किसी का खून कर दो....बलात्कार करो फिर गंगा नहाओ....पाप कटेंगे....
मैने किसी धर्म को ये कहते नहीं सुना कि लूट खसोट करो....मारो काटो,चोरी करो,बलात्कार करो फिर इतनी धार्मिक सोसायटी में ये कौन सी फसल है जो इन कामों को अंजाम देती है.......या हम क्यों नहीं स्वीकार करते कि हममें में से ही ये लोग होते है.....जो वहशत फैलाते है....जानवर बन जाते है लेकिन ढोंग करना नहीं छोड़ते....पांचो वक्त के नमाज़ी बनो.......कट्टरता का पालन करो..........महिलाओं की बेइज्जती करो और तालिबानी कहलाओ.....कितना भी पाप क्यो ना हो गया हो....चर्च में जाओ पादरी के सामने कन्फेस करो और सब खत्म......सबकुछ इतना सस्ता क्यो नज़र आता है....
गुजरात का गोधरा कांड हो या फिर उड़ीसा का कंधमाल.....कई लोगों ने दूसरों की ज़िंदगिया उजाड़ कर अपने सीने को चौडा़ किया....धर्म को बेहतरीन तौर पर इस्तेमाल किया गया.....राजनीतिक दल कहां पीछे है.......सौगन्ध राम की खाते हैं...मंदिर वहीं बनाएंगे......कब का नारा है ये....आजतक इसी के पीछे वोट मांगती है बीजेपी.....बीएसपी भी इसी के नक्शेकदम पर है....हाथी नहीं गणेश है.....ब्रहमा,विष्णु,महेश है......क्या आम धार्मिक इंसान की धार्मिक आस्था इतनी सस्ती है कि ये लोग उसका मनचाहा उपयोग कर अपने स्वार्थ पूर्ति कर सकते हैं औऱ एक बार नहीं बार –बार....क्यूं भई क्यूं....कब तक हम यूंही धर्म के नाम पर अपनी भावनाओं का बलात्कार और चीरहरण होने देंगे.......और क्यों भगवान(अगर कहीं है तो) आकर बचाते नहीं इस दुनिया को.........
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मंगलवार, 24 मार्च 2009
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